विशेष संपादकीय - कैलाश आचार्य (स्वतंत्र पत्रकार)


@CGEYE24.COM / रायगढ़। रायगढ़ की पहचान प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक और राजस्व केंद्रों में होती है। उद्योगों और कारोबार से बड़ी आर्थिक गतिविधियां होने के बावजूद शहर की बुनियादी सुविधाओं और यातायात व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। एक सार्वजनिक व्हाट्सएप ग्रुप पर चर्चा में उठी दो टिप्पणियों ने इसी विरोधाभास को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।


क्या कहा गया?...

पहली टिप्पणी समाजसेवी सत्य प्रकाश शर्मा जी की है। शर्मा शहर के मुद्दों पर खुलकर विचार रखने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा - "रायगढ़ में अधिकारी आते हैं काम करने के लिए... जब वह काम चालू करते हैं तो कुछ जरायम पेशेवरों द्वारा उनका विरोध होता है। सभी दल के लोग एक हो जाते हैं क्योंकि सभी की कुछ ना कुछ दुकान शहर के अंदर बेजा कब्जे में है। तो फिर अधिकारी काम नहीं करता, वह बोलता है यह शहर पैसों का शहर है, पैसा लपेटो दूसरी जगह जाओ..."


इस पर वरिष्ठ पत्रकार विजयंत खेंदुलकर जी ने टिप्पणी करते हुए लिखा - "वही तो बात है भैया.. इतना रेवेन्यू जनरेट करने वाला रायगढ़... आज भी शहर नहीं बन पाया है... ट्रांसपोर्टनगर बना पर बस नहीं पाया.. अंतरराज्यीय बस अड्डा.. जमीन अवैध कब्जे की भेंट चढ़ गई.. स्टेडियम.. भगवान ही मालिक.. सड़कें तो फिर जाने ही दें.. हर जगह ठेले गुमटियों का कब्जा.. सड़कों में पार्किंग.. और थोक विक्रेताओं द्वारा सड़कों पर लोडिंग अनलोडिंग... कोई देखने वाला नहीं.."


सवाल क्यों गंभीर है?.....

इन दो टिप्पणियों ने रायगढ़ की जमीनी व्यवस्था से जुड़े कई पुराने सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। ट्रांसपोर्ट नगर, अंतरराज्यीय बस अड्डा, स्टेडियम, सड़कों पर ठेले-गुमटियों और बेतरतीब पार्किंग तथा थोक प्रतिष्ठानों के सामने लोडिंग-अनलोडिंग से यातायात प्रभावित होने जैसी शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं।


बहरहाल इस चर्चा का सार किसी व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि व्यवस्था से जवाब मांगना है। सवाल यह है कि राजस्व और विकास के दावों के बीच नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दे वर्षों बाद भी स्थायी समाधान तक क्यों नहीं पहुंच पा रहे हैं। यही सवाल अब प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने है।


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