कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा वन मंडल में एक बार फिर हाथी-मानव संघर्ष ने एक परिवार की खुशियां छीन लीं। वन परिक्षेत्र करतला अंतर्गत शनिवार सुबह जंगल गए एक ग्रामीण की जंगली हाथी के हमले में दर्दनाक मौत हो गई। घटना ने पूरे क्षेत्र को स्तब्ध कर दिया है और एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर विकास की अंधी दौड़ में सिकुड़ते जंगलों की कीमत कब तक इंसान और वन्यजीव अपनी जान देकर चुकाते रहेंगे?


प्राप्त जानकारी के अनुसार बड़मार निवासी जगेश्वर राठिया किसी कार्य से जंगल गए थे। इसी दौरान उनका सामना हाथी से हो गया। अचानक हुए हमले में हाथी ने उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। जब आसपास के ग्रामीणों ने जंगल में उनका खून से लथपथ शव देखा तो पूरे गांव में शोक और दहशत फैल गई।


घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। शव को कब्जे में लेकर पंचनामा कार्रवाई शुरू कर दी गई है तथा आगे की जांच जारी है।


यह घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि लगातार गहराते पर्यावरणीय संकट की चेतावनी भी है। औद्योगिक विस्तार, खनन परियोजनाओं और अंधाधुंध जंगलों की कटाई ने हाथियों के प्राकृतिक आवास और पारंपरिक विचरण मार्गों को बुरी तरह प्रभावित किया है। भोजन और सुरक्षित आवास की तलाश में हाथियों का गांवों की ओर रुख करना अब सामान्य होता जा रहा है, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा निर्दोष ग्रामीणों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ रहा है।


वन विभाग ने क्षेत्र में हाथियों की लगातार मौजूदगी को देखते हुए ग्रामीणों से बिना आवश्यक कारण जंगल की ओर नहीं जाने तथा विशेष सतर्कता बरतने की अपील की है। विभाग द्वारा हाथियों की निगरानी बढ़ाने और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने की बात कही गई है।


प्रश्न यह है कि क्या केवल चेतावनियां और मुआवजे इस समस्या का समाधान हैं? जब तक जंगलों का संरक्षण, हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर की सुरक्षा और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक हाथी-मानव संघर्ष की ऐसी दर्दनाक घटनाएं शायद यूं ही दोहराती रहेंगी।