@cgeye24.com रायगढ़। कलेक्ट्रेट कार्यालय रायगढ़ की राहत एवं आपदा प्रबंधन शाखा में पदस्थ एक बाबू को एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) बिलासपुर ने कथित तौर पर 50 हजार रुपये की रिश्वत के मामले में रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। आरोप है कि बाढ़ में सर्पदंश से हुई मौत के बाद शासन से मिलने वाली मुआवजा राशि का भुगतान कराने के एवज में पीड़ित पक्ष से रिश्वत की मांग की गई थी। एसीबी की कार्रवाई के बाद कलेक्ट्रेट के भीतर एक बार फिर भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ग्राम बुलाकी, तहसील पुसौर निवासी विजय सिदार ने एसीबी बिलासपुर में शिकायत की थी कि उनकी पत्नी रामकुमारी की वर्ष 2023 में बाढ़ एवं सर्पदंश से मृत्यु हो गई थी। शासन की ओर से मिलने वाली मुआवजा राशि प्राप्त करने के लिए उनके द्वारा राजस्व विभाग में आवेदन किया गया था। शिकायतकर्ता के अनुसार, मुआवजा प्रकरण कलेक्टर कार्यालय रायगढ़ में लंबित था।
बताया गया कि इस मामले में कलेक्टर कार्यालय रायगढ़ की राहत एवं आपदा प्रबंधन शाखा के बाबू राजकुमार सिदार से संपर्क करने पर कथित रूप से मुआवजा राशि दिलाने के एवज में 50 हजार रुपये की मांग की गई। शिकायतकर्ता का आरोप था कि आरोपी द्वारा पहले कथित तौर पर 50 हजार रुपये नकद देने की बात कही गई, लेकिन बाद में हस्ताक्षरित चेक देने के लिए दबाव बनाया गया।
ACB ने बिछाया जाल, 50 हजार के चेक के साथ दबोचा
शिकायत के सत्यापन के बाद एसीबी बिलासपुर की टीम ने कार्रवाई की। प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, 28 जुलाई 2026 को आरोपी राजकुमार सिदार को शिकायतकर्ता से 50 हजार रुपये का चेक प्राप्त करते हुए गिरफ्तार किया गया। आरोपी के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित अधिनियम 2018) के तहत कार्रवाई की जा रही है।
यह कार्रवाई ऐसे समय में सामने आई है, जब सरकारी दफ्तरों में आम नागरिकों को अपने वैध काम के लिए भी कथित तौर पर दलालों और रिश्वतखोरी के जाल से गुजरने के आरोप लगातार उठते रहे हैं। सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस मुआवजा राशि का उद्देश्य आपदा में अपने परिजन को खो चुके परिवार को आर्थिक सहारा देना है, उसी राशि को दिलाने के नाम पर रिश्वत की कथित मांग आखिर किस तरह की संवेदनहीन कार्यप्रणाली की ओर इशारा करती है?
बड़ा सवाल: मुआवजे के लिए भी 'कीमत' तय?
बाढ़ और सर्पदंश जैसी त्रासदी में परिवार के सदस्य को खोने वाला व्यक्ति शासन की राहत का हकदार होता है। ऐसे में यदि उस सहायता राशि को जारी कराने के लिए रिश्वत की कथित मांग की जाती है, तो यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि आपदा पीड़ित परिवार की मजबूरी और उसकी पीड़ा का कथित शोषण भी माना जा सकता है।
एसीबी की ट्रैप कार्रवाई ने कलेक्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, पूरे मामले की वास्तविकता और इसमें किसी अन्य अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
फिलहाल एसीबी की कार्रवाई ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि शासन की राहत राशि जरूरतमंद तक पहुंचाने वाली व्यवस्था में कहीं 'राहत' से पहले 'रिश्वत' का रास्ता तो नहीं बन गया था?

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