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रायगढ़ रेलवे स्टेशन पर जहर बन रहा पानी? इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर ने लाइव वॉटर टेस्टिंग कर खोली दावों की पोल, सोशल मीडिया पर मचा हड़कंप!!

CG EYE 24 Admin · 17 जून 2026 · रायगढ़ रेलवे स्टेशन

रायगढ़@CG EYE 24 न्यूज :- छत्तीसगढ़ के औद्योगिक शहर रायगढ़ से इस वक्त एक ऐसी सनसनीखेज और आंखें खोल देने वाली खबर सामने आ रही है, जो हर उस आम नागरिक से जुड़ी है जो घर से बाहर निकलते समय सार्वजनिक प्याऊ या रेलवे स्टेशन के पानी पर भरोसा करता है। सोशल मीडिया के इस दौर में जहां डिजिटल क्रिएटर मनोरंजन से आगे बढ़कर सामाजिक मुद्दों को उठा रहे हैं, वहीं रायगढ़ के एक स्थानीय इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर ने कुछ ऐसा कर दिखाया है जिसने पूरे प्रशासनिक अमले को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इस इन्फ्लुएंसर ने अपनी निजी और पोर्टेबल वॉटर टेस्टिंग टीडीएस (Total Dissolved Solids) मशीन लेकर शहर के विभिन्न सार्वजनिक प्याऊ और रायगढ़ रेलवे स्टेशन पर लगे पानी के नलों की गुणवत्ता की लाइव जांच की। इस औचक परीक्षण के जो नतीजे सामने आए हैं, उसने न सिर्फ पानी की शुद्धता के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं, बल्कि रेलवे स्टेशन के नल से निकले 435 टीडीएस के आंकड़े ने यात्रियों की सेहत को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।

यह ट्रेंडिंग वीडियो इस समय सोशल मीडिया के कुछ प्लेटफॉर्म पर तेजी से शेयर किया जा रहा है और स्थानीय व्हाट्सएप ग्रुप्स से लेकर फेसबुक-इंस्टाग्राम पर जनता का गुस्सा फूट रहा है। इन्फ्लुएंसर ने जब अपनी वॉटर टेस्टिंग मशीन को रायगढ़ रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर स्थित पेयजल नल में डाला, तो मशीन की डिजिटल स्क्रीन पर टीडीएस का स्तर सीधे 435 पर जाकर रुका। यह संख्या इसलिए डराने वाली है क्योंकि रेलवे स्टेशनों पर बड़े-बड़े फिल्टरेशन प्लांट और वाटर प्यूरीफायर लगाने के दावे किए जाते हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य पानी में घुली अशुद्धियों को कम करके उसे इंसानी शरीर के लिए पूरी तरह सुरक्षित और सुपाच्य बनाना होता है। लेकिन 435 का टीडीएस लेवल यह साफ गवाही दे रहा है कि यात्रियों को जो पानी पिलाया जा रहा है, वह किसी भी तरह से फिल्टर्ड या ट्रीटेड वाटर नहीं है, बल्कि वह सीधे बोरवेल या जमीन के भीतर से निकाला गया अत्यधिक भारी और अनफिल्टर्ड पानी है, जिसे बिना किसी शुद्धिकरण प्रक्रिया के सीधे नलों तक पहुंचा दिया गया है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के कड़े नियमों के चश्मे से देखें तो पानी का यह स्तर किसी भी तरह से आदर्श नहीं माना जा सकता। हालांकि वैज्ञानिक और चिकित्सा आधार पर 500 टीडीएस तक के पानी को आपातकालीन परिस्थितियों में पीने योग्य (Permissible Limit) की श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन यह नियम केवल साधारण और प्राकृतिक कच्चे पानी के स्रोतों पर लागू होता है। जब बात किसी सरकारी संस्थान, रेलवे स्टेशन या सार्वजनिक वॉटर बूथ की हो, जहां बकायदा शुद्ध पेयजल (Water Cooler/RO) की व्यवस्था का दावा किया जाता है, वहां का टीडीएस स्तर 150 से लेकर अधिकतम 200 के भीतर होना अनिवार्य है। ऐसे में 435 का भारी टीडीएस सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि पानी में हानिकारक मिनरल्स, लवण, कैल्शियम, मैग्नीशियम और भारी धातुओं की मात्रा बेहद असंतुलित है। लगातार इस तरह के भारी और दूषित पानी का सेवन करने से इंसानी शरीर में किडनी स्टोन (पथरी), पेट से जुड़ी गंभीर बीमारियां, पाचन तंत्र का पूरी तरह खराब होना और लिवर से संबंधित रोग होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

इस वायरल वीडियो और ग्राउंड रिपोर्ट के सामने आने के बाद रायगढ़ रेलवे प्रबंधन के साथ-साथ स्थानीय नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की गहरी नींद उड़ गई है। रायगढ़ एक ऐसा प्रमुख रेलवे स्टेशन है जहां से प्रतिदिन हजारों की तादाद में श्रमिक, व्यापारी, छात्र और परिवार सफर करते हैं और भीषण गर्मी व उमस भरे मौसम में अपनी प्यास बुझाने के लिए पूरी तरह इन्हीं सरकारी नलों पर निर्भर रहते हैं। जनता अब सोशल मीडिया पर यह तीखा सवाल पूछ रही है कि करोड़ों रुपये का राजस्व देने वाले इस महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की जान और सेहत की कीमत इतनी सस्ती क्यों समझी जा रही है? क्या रेलवे के स्वास्थ्य निरीक्षक और संबंधित इंजीनियर कभी इन नलों की गुणवत्ता जांचने की जहमत उठाते हैं, या फिर सिर्फ कागजों पर ही मेंटेनेंस का खेल चल रहा है? इस पूरे मामले ने अब एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले लिया है और नागरिकों की मांग है कि प्रशासन तुरंत इस डिजिटल रिपोर्ट को संज्ञान में ले, शहर के सभी सार्वजनिक जल स्रोतों की सरकारी लैब से जांच कराई जाए और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों व ठेकेदारों पर तत्काल कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

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